विभिन्न रोगों में सामान्य जड़ी-बूटियों का प्रयोग

हमारे देश के प्रत्येक घर में भोजन निर्माण और अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बहुत सारी वस्तुऐ प्रयोग में लाई जाती हैं | नमक, चीनी, गुड़, जीरा, हींग, धनिया, हल्दी, अजवाइन, लौंग, सोंठ, पीपल (पिप्पली), कालीमिर्च, जायफल, तेजपत्र, दालचीनी, सरसों का तेल, नारियल का तेल, देसीघी, कर्पूर, कत्था, प्याज, लहसुन, अदरक, आलू, लौकी और घीकुवांर आदि कुछ महत्वपूर्ण मसाले/वस्तुओं का प्रयोग विभिन्न रोगों में सामान्यत: किया जाता है | कुछ विशेष रोगों में इनका प्रयोग निम्न प्रकार किया जाता है |

  • नस खिंच जाने की स्थिति में- सैंधा नमक के पानी से सिकाई करनी चाहिए त्तथा हल्दी, नमक, सरसों के तैल का स्थानीय प्रयोग (Local application) किया जाता है |
  • सूजन (Swelling/ Inflammation)- हल्दी व चूने का लेप (स्थानीय प्रयोग) लाभकारी होता है |
  • गुमचोट लगने/नील पड़ना (Contusion/bruise)- चोट लगने से सूजन होने पर शुद्ध हल्दी का चूर्ण 1/2-1 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ पीने से बहुत लाभ होता है |
  • चोट लगने पर जामुन की गुठली पीस कर लगाने से खून बंद हो जाता है |
  • मोच आने और हड्डी की चोट में भी हल्दी का बाह्यऔर आभ्यांतर प्रयोग लाभकारी है |
  • Herpes Zooster- नमक (Common salt) को गरम पानी में गाढ़ा घोल बनाकर स्वच्छ रुई से स्थानीय प्रयोग करना चाहिए इससे फफोले नहीं पड़ते हैं तथा जलन रो दर्द भी शीघ्रता से नष्ट होता है |
  • त्वक विकार (Skin lesions, urticaria)- हल्दी का स्थानीय प्रयोग व खाने के लिए प्रयोग कराना चाहिए |
  • आंव, दस्त (Dysentry)- आंव, दस्त की स्थिति में सोंठ और सौंफ का प्रयोग लाभकारी होता है | यदि दूध पीने से आंव, दस्त की स्थिति होती हो तो दूध में सोंठ मिलाकर पीना चाहिए |
  • अतिसार (Diarrhoea)- नमक और चीनी का पानी में घोल बनाकर (मुख द्वारा) प्रयोग करना चाहिए |
  • कृमिविकार (Worm infestation)- 4 भाग अजवाइन, 2 भाग कालानमक, 1 भाग हींग मिलाकर चूर्ण बनाकर 2 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम गर्म पानी से प्रयोग करना चाहिए |
  • फीताकृमि और अंकुश कृमि (Tape worm and Hook worm)- फीताकृमि और अंकुश कृमि के लिए आडू (Peach) के पाँच पत्ते, नीम के पाँच पत्ते और मात्रा में दूब घास को धोकर साफ कर पीसकर चटनी बनाकर प्रयोग कराने से लाभ होता है |
  • बलगम के साथ खांसी (Cough with sputum) – दूध में पिप्पली उबालकर लेना लाभप्रद है |
  • खांसी- (Cough)- हल्दी भून कर दूध से आधा चम्मच सुबह शाम लेने से खांसी ठीक हो जाती है | अत्यधिक बलगम (Excessive expectoration) की स्थिति में दूध के साथ सोंठ, मरिच, पिप्पली का चूर्ण का प्रयोग करते हैं | पिप्पली क्षीरपाक का प्रयोग फेफड़ों के रोगों में लाभप्रद है |
  • खांसी (Cough) में अदरक के स्वरस का शहद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए | यदि दूध पीने से खांसी होती हो तो त्रिकटु को दूध में मिलाकर पीना चाहिए |
  • फुफ्फुस आवरण शोथ (Pneumonia)- जायफल को घिसकर शहद के साथ चाटने से और सैंधानमक पीसकर छाती में लगाने से लाभ होता है |
  • सर्दी, नजला (llergic rhinitis)- कालीमिर्च, हल्दी भूनकर आधा चम्मच सुबह शाम तथा (हर्रा) का चूर्ण आधा चम्मच सुबह शाम गर्म जल से लेने पर लाभ होता है |
  • काली मिर्च को भिगोकर, रगड़कर एंव छिलका निकालकर, सुखाकर सुरक्षित रख लें | चार दिनों दाँतों से चबाकर जीभ के नीचे रखने पर सर्दी, जुकाम में तुरंत आराम मिलता है |
  • जुकाम (Cold and Coryza)- 4-5 बूंद सरसों का तैल का नस्य (नासिका रन्ध्रों द्वारा ली जाने वाली औषधि) जुकाम में अत्यंत लाभकारी होता है |
  • गठिया एंव मांसपेशियों का दर्द (Arthritis and Muscular pain)- अजवाइन, लहसुन आदि को तैल में पकाकर एंव कपूर मिलाकर स्थानीय प्रयोग करते है | लहसुन का तैल, लहसुन का रस और सरसों के तैल की मालिश जोड़ों के दर्द में करते हैं |
  • संधिवात, गठिया (Joints pain)- दूध से लेने पर लाभ होता है |
  • नागर मोथा जोड़ों के दर्द की अचूक दवा है | नागर मोथा (साइप्रस रोटंडस) की जड़ का चूर्ण 1/2 ग्राम से 1 ग्राम, सुबह शाम लगातार खाने से आमवात, संधिवात में लाभ होता है अन्य प्रचलित आयुर्वेदिक दवाओं एंव एलोपैथिक वेदनाहर दवाओं के विपरीत इस दवा का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है |
  • जीर्ण संधिवात, गठिया- एरण्ड का तैल मालिश के लिये व 1 से 2 चम्मच दूध के साथ पीने के लिये देना चाहिए | गठिया रोग में वरित (Enema) के लिये भी एरण्ड तैल का प्रयोग लाभदायक होता है |
  • व्रण रोपक (घाव) भरने के लिये (Wound healing)- देसी घी का स्थानीय प्रयोग, मलाई का स्थानीय प्रयोग, हल्दी का स्थानीय व आभ्यान्तर प्रयोग लाभकारी है |
  • व्रण रोपक (घाव भरने के लिये)- आलू का गूद, घीकुवांर का गूदा तथा पुराना गाय का घी लगाने से पुराने घाव भर जाते हैं |
  • मुँह के व्रण (घाव) भरने के लिये (Wound healing in oral cavity)- अमरुद की पत्तियों का काढ़ा तथा कत्थे का स्थानीय प्रयोग करना चाहिए |
  • कर्णशूल – लहसुन का तैल, (लहसुन के रस को सरसों के तैल में पकाकर) कान में डालने से लाभ होता है |
  • सिर दर्द (Head ache)- लौकी के गुदे को सिर में लगाने से लाभ होता है |
  • निद्रा नाश (Insomnia)- ब्राह्यी, जटामांसी का चूर्ण आधा चम्मच रात को सोते समय गाय के दूध से लेने पर लाभ होता है |
  • मेधा शक्ति वर्धन के लिये (To increase Mental strength)- बादाम, कालीमिर्च चूर्ण को गाय के घी में भूनकर, दूध में उबालकर प्रयोग कराया जाता है |
  • बाल झड़ना (Hair Loss)- ऑवले का प्रयोग खाने और लगाने के लिये करना चाहिये |
  • नेत्र ज्योतिवर्धन हेतु होली के त्यौहार के अवसर पर जब आँवले पक जाते है उस समय आँवले तोड़कर सुखा लें तथा बीज निकालकर चूर्ण बनाकर, आंवले के रस में भिगाकर सुखा लें, इस प्रक्रिया को 21 बार दोहरायें, इस आमलकी रसायन का प्रयोग शहद के साथ लाभप्रद होता है |
  • मोतिया बिंद (Cataract)- सफेद प्याज का स्वरस, छोटी मक्खी के शहद में मिलाकर 1 बूंद आँख में डालने से लाभ होता है |
  • मधुमेह (Diabetes)- दालचीनी, तेजपत्र, मेथी, जामुन के बीज, करेले का चूर्ण- 1 / 2 चम्मच सुबह शाम प्रयोग करने से मधुमेह रोग में लाभ होता है |
  • Post Menopause Sndrome (P.M.s)- जीरा तथा धनिया पाउडर मिलाकर आधा चम्मच सुबह शाम प्रयोग करने से लक्षणों में तुरंत लाभ होता है |
  • ह्रदय रोग (Heart Disease)- बड़ी इलायची के बीच का चूर्ण शहद मिलाकर चाटना चाहिए |
  • रक्तचाप (P.) व अत्यधिक पसीने की स्थिति में यदि मेथी का प्रयोग आवश्यक हो तो मेथी बीज को गाय के दूध में भिगाकर, तत्पश्चात सुखाकर घी में भूनकर पीस लें तथा 1 / 2 चम्मच सुबह शाम गाय के दूध से प्रयोग कराना चाहिए |
  • ज्वर व अत्यधिक पसीने को स्थिति- आधा चम्मच धनिया पाउडर, सुबह शाम नारियल के पानी के साथ प्रयोग कराना चाहिए | लम्बे समय तक बुखार रहने पर गिलोय का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है |
  • डेंगू एंव अन्य विषाणु जन्य बुखारों में अजवायन, खूबकलां तथा गिलोय के काढ़े का प्रयोग लाभकारी होता है | प्लेटलेट्स की कमी होने पर पपीते के पत्ते का स्वरस अत्यंत लाभकारी है | भोजन में हल्का, सुपाच्य भोजन तथा अनार और अन्य फलों के रस का प्रचुर मात्रा में प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है |
  • गर्मी लगने पर- सौंफ और कालीमिर्च का मिश्री से बना शरबत पीना चाहिए | लू लगने की अवस्था में पुदीना युक्त कच्चे आम का पन्ना प्रयोग करना चाहिए |
  • स्तन्यवर्धक (Medication inducing Lactation)- जीरा चूर्ण दूध के साथ पिलाना चाहिए |
  • जलन की चिकित्सा- जलन की चिकित्सा जल है |
  • ठण्डे पानी की पट्टी या धारा डालने से जलन शांत होती है |
  • घी या मक्खन को कांसे के बर्तन में रख कर पानी से सौ बार धोये घी या मक्खन का प्रयोग लगाने के लिए खाने के लिए करना जलन शांत करने के लिए लाभकारी होता है |
  • हाथ पैर या शरीर के किसी भाग पर जलन होने पर लौकी, या आलू का गूदा मलते है या लौकी और आलू को बारीक़ पीस कर लेप भी कर सकते है |
  • छाती में जलन होने पर नारियल पानी, ठण्डा दूध या जौ का सत्तू ठण्डे पानी के साथ पीने से लाभ होता है |
  • धनियाँ बीज को कूट कर पानी में भिगोकर, मसल कर तथा छान कर पिलाने से जलन एंव बुखार में बहुत लाभ होता है इससे पेशाब की जलन में भी फायदा होता है |
  • जलने पर (Burn lesions)- नारियल का तेल और चूने के पानी का स्थानीय प्रयोग जलने पर लाभकारी होता है |
  • कैंसर जैसे रोगों में रेडियोथेरापी के बाद स्थानीय जलन को दूर करने के लिए घी कुंवार (ऐलोवेरा) का स्थानीय प्रयोग लाभदायक होता है |

मर्म चिकित्सा का परिचय एवं ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि

मनुष्य शरीर को धर्म, अर्थ काम और मोक्ष का आधार माना गया है| इस मनुष्य शरीर से समस्त लौकिक एवं पारलौकिक उपलब्धियों/ सिद्धियों को पाया जा सकता है| वहीं ‘शरीरं व्याधि मंदिरम’ भी कहा गया है| क्या रोगी एवं अस्वस्थ शरीर से इन चारों फलों की प्राप्ति संभव है? क्या धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के साधन इस शरीर को स्वस्थ रखने एवं इसको माध्यम बनाकर अनेक सिद्धियों को प्राप्त करने का कोई उपाय है? इस प्रश्न के उत्तर में मर्म विद्या का नाम लिया जा सकता है|

वास्तव में मानव शरीर आरोग्य का मंदिर एवं साहस, शक्ति, उत्साह का समुद्र है, क्योंकि इस मनुष्य शरीर में परमात्मा का वास है| स्कन्द पुराण के अनुसार मनुष्य की नाभि में ब्रह्मा, ह्रदय में श्रीविष्णु एवं चक्रों में श्रीसदाशिव का निवास स्थान है| ब्रह्मा वायुतत्व, रुद्र अग्नितत्व एवं विष्णु सोमतत्व के बोधक है| यह विचारणीय विषय है कि परमात्मा का वास होने पर यह शरीर रोगी कैसे हो सकता है? यदि हम इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें तो हमे इन समस्त समस्याओं का समाधान इसी शरीर में प्राप्त हो जाता है| योग, प्राणायाम एवं मर्म चिकित्सा के माध्यम से शरीर को स्वस्थ कर आयु और आरोग्यसंवर्धन के संकल्प को पूरा किया जा सकता है| जहाँ योग और प्राणायाम ‘स्वस्थ्यस्वास्थयरक्षणम’ के उद्देश्य के पूर्ति करता है, वहीं मर्म चिकित्सा तुरंत कार्यकारी एवं सद्यः फलदायी होने से रोगों को कुछ ही समय में ठीक कर देती है| यह आश्चर्यजनक, विस्मयकारी चिकित्सा पद्धति बौद्ध काल में बुद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया सहित सम्पूर्ण विश्व में एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर आदि अनेक विधाओं के रूप में  विकसित हुई|

ईश्वर स्त्री सत्तात्मक है, अथवा पुरुष सत्तात्मक यह कहना संभव नही है, परन्तु ईश्वर हम सभी से माता-पिता के समान प्रेम करता है| ईश्वर ने वह सभी वस्तुएं हमें प्रदान की है, जो की हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं| ईश्वर ने हमें असीमित क्षमता प्रदान की है, जिससे हम अनेक भौतिक और अध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करते है| स्व-रोग निवारण क्षमता इन्ही शक्तियों में से एक है, जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रह सकता है| विज्ञान के द्वारा भौतिक जगत के रहस्यों को ही समझा जा सकता है, जबकि दर्शन के द्वारा भौतिक जगत के वास्तविक रहस्य के साथ साथ उसके अध्यात्मिक पक्ष को समझने में भी सहायता मिलती है| ईश्वर ने अपनी इच्छा की प्रतिपूर्ति के लिए इस संसार की उत्पत्ति की है तथा उसने ही अपनी अपरिमित आकांक्षा के वशीभूत मनुष्य को असीम क्षमताओं से सुसंपन्न कर पैदा किया है| दुःख एवं कष्ट रहित स्वस्थ जीवन इस क्षमता का परिणाम है| सार रूप यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है की ईश्वर का पुत्र होने के कारण मनुष्य समस्त ईश्वरीय गुणों और क्षमताओं से सुसंपन्न है| मनुष्य शरीर प्रक्रति/ ईश्वर द्वारा त्रुटिहीन तकनीक संपन्न मशीन है| जब जीवन के आधारभूत सिद्धांतों की अवहेलना की जाती है, तब यह शरीर अस्वस्थ होता है| मनुष्य शरीर में स्थित ईश्वर- प्रदत्त स्वरोग निवारण-क्षमता हमारी व्यक्तिगत उपलब्धि नही है, वरन मनुष्य शरीर में ईश्वरीय गुणों की उपस्थिति का ही द्योतक है|

अनुमानों पर आधारित विज्ञान के द्वारा किसी भी तथ्य को सम्पूर्णता से जानना संभव नही है| अतः मर्म विज्ञान की समीक्षा वर्तमान वैज्ञानिक मानदंडो के आधार पर कर्म उक्ति संगत और समीचीन नही है| इसके आधार पर मर्म विषयक किसी एक पक्ष का ज्ञान ही प्राप्त हो सकता है| समवेत परिणामों की समग्र समीक्षा इसके माध्यम से संभव नही है| मर्म चिकित्सा एक एसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमे अल्प समय में थोड़े से अभ्यास से अनायास उन सभी लाभों को प्राप्त किया जा सकता है, जो किसी भी प्रकार की प्रचलित व्यायाम विधि द्वारा मनुष्य को उपलब्ध होता है| आवश्यकता मर्म विज्ञान एवं मर्म चिकित्सा के प्रचार एवं प्रसार की है, जिससे अधिक से अधिक लोग इस चिकित्सा पद्धति का लाभ उठा सकें| जहाँ अन्य चिकित्सा पद्धतियों का इतिहास कुछ सौ वर्षों से लेकर हजारों वर्ष तक का माना जाता है, वहीँ मर्म चिकित्सा पद्धति को काल खंड में नही बाँधा जा सकता है| मर्म चिकित्सा द्वारा क्रियाशील किया जाने वाला तंत्र (107 मर्म स्थान) इस मनुष्य- शरीर में मनुष्य के विकास क्रम से ही उपलब्ध है| समस्त चिकित्सा पद्धतियाँ मनुष्य द्वारा विकसित की गई है, परन्तु मर्म चिकित्सा प्रकृति/ इश्वर प्रद्त्त्त चिकित्सा पद्धति है| अतः इसके परिणामों की तुलना अन्य चिकित्सा पद्धतियों से नही की जा सकती| अन्य किसी भी पद्धति से अनेक असाध्य रोगों को मर्म चिकित्सा द्वारा आसानी से उपचारित किया जा सकता है| मर्म चिकित्सा ईश्वरीय विज्ञान है, चमत्कार नही| इसके सकारात्मक प्रभावों से किसी को चमत्कृत एवं आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नही, आश्चर्य तो अपने शरीर को न जानने समझने का है, कि हम इनको न जानकर भयावह कष्ट रोग भोग रहे है| इस मानव शरीर में असीम क्षमताएं एवं संभावनाएं है, मर्म चिकित्सा तो स्वस्थ्य विषयक समस्याओं के निवारण का एक छोटा सा उदहारण मात्र है|

ईश्वर ने मनुष्य शरीर में स्वास्थ्य संरक्षण, रोग निवारण एवं अतीन्द्रिय शक्तियों को जाग्रत करने हेतु 107 मर्म स्थानों का सृजन किया है| कई मर्मो की संख्या 1 से 5 तक है| ईश्वर की उदारता का इससे बड़ा उदहारण क्या हो सकता है की उसने 4 तल ह्रदय मर्म, 4 इन्द्र्वस्ति आदि मर्म बनाये है, इसका आवश्यकतानुसार (अंगभंग होने की अवस्था) प्रयोग कर लाभान्वित हुआ जा सकता है| मर्म चिकित्सा विश्व की सबसे सुलभ, सस्ती, सार्वभौमिक, स्वतंत्र और सद्यःफल देने वाली चिकित्सा पद्धति कही जा सकती है| बिना औषधि प्रयोग एवं शल्य कर्म के रोग निवारण की क्षमता इस शरीर में देकर इश्वर ने मानवता पर परम उपकार किया है| मर्म चिकित्सा के सद्यः परिणामों को देखकर ईश्वर की उदारता के प्रति कृतज्ञता का सागर लहराने लगता है|

मनुष्य-शरीर की क्षमताओं का आंकलन करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है, की यह शरीर ईश्वर की सर्वोतम कृति है| समस्त लौकिक और परलौकिक क्षमताएं/सिद्धियाँ इसी के माध्यम से पाई जा सकती है| यह शरीर मोक्ष का द्वार है| नव दुर्गो (नौ किलों) से रक्षित यह नगरी (शरीर) ही स्वर्ग है| यह नव दुर्ग या नौ द्वार हमारी इन्द्रियां है| मर्म चिकित्सा हजारों साल पुरानी वैदिक चिकित्सा पद्धति है| परिभाषा के अनुसार “या क्रियाव्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते” अर्थात कोई भी क्रिया जिसके द्वारा रोग की निवृति होती है, वह चिकित्सा कहलाती है| चिकित्सा पद्धतियों की प्राचीनता पर विचार करने से यह स्पष्ट है की औषधियों के गुण-धर्म और कल्पना का ज्ञान होने से पूर्व स्वस्थ रहने के एकमात्र उपाय के रूप में मर्म चिकित्सा का ज्ञान जन सामान्य को ज्ञात था| उस समय स्वस्थ्यसंवर्धन एवं रोगों की चिकित्सा के लिए मर्म चिकित्सा का प्रयोग किया जाता था| अत्यंत प्रभावशाली होने तथा अज्ञानतावश की गई मर्म चिकित्सा के द्यातक प्रभाव होने से इस पद्धति का स्थान आयुर्वेदीय औषधि चिकित्सा ने ले लिया था, यह पद्धति मर्मचिकित्साविदों द्वारा गुप्त विद्या के रूप में परम्परागत रूप से सिखाई जाने लगी| व्यापक प्रचार एवं शिक्षण के आभाव में यह विज्ञान प्रायः लुप्त हो गया| सही स्वरुप एवं विधि से उपयोग करने पर अत्यंत द्यातक होने के कारण मर्म चिकित्सा का ज्ञान हजारों वर्ष तक अप्रकाशित रखा गया| इसको अनेक ऋषियों ने अपने अभ्यास एवं ज्ञानचक्षुओं से जाना जाता लोकहितार्थ उसका उपयोग किया| प्राचीन कल में इस विद्या को गुप्त रखने का क्या उद्देश्य रहा होगा, इसको जानने से पहले यह जानना आवश्यक है की मर्म क्या है? चिकित्सकीय परिभाषा के अनुसार ‘मारयन्तीतिमर्माणि’ अर्थात शरीर के वह विशिष्ट भाग जिन पर आघात करने अर्थात चोट लगने से मृत्यु संभव है, उन्हें मर्म कहा जाता है| इसका सीधा अर्थ यह है की शरीर का यह भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है, तथा जीवनदायनी ऊर्जा से युक्त है| इन पर होने वाला आघात मृत्यु का कारण हो सकता है| इन स्थानों पर प्राणों का विशेष रूप से वास होता है| अतः इन स्थानों की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए|

अभी तक मर्मविज्ञान के विषय में अधिक जानकारी न होने के कारण इस महत्वपूर्ण विद्या का प्रचार-प्रसार नही हो पाया| इसके उपयोग के विषय में अधिकांश आयुर्वेद विशेषज्ञ अनभिज्ञ रहे है| मर्मो के वर्णन को मात्र शरीर रचना का विषय मान लिया गया| मैं सुश्रुत संहिता- षष्टम अध्याय ‘प्रत्येक मर्म निर्देश’ नामक अध्याय में डॉ0 भास्कर गोविन्द घाणेकर के विमर्श का कुछ अंश उदधृत करना चाहूँगा- डॉ0 घाणेकर के अनुसार-

“मर्म शब्द की निरुक्ति उपर्युक्त प्रकार से ग्रंथो में वर्णित है, और व्यव्हार में भी मर्म के ऊपर आघात या प्रहार होने से (ह्रदय के सम्बन्ध से मानसिक अघात होने से भी) म्रत्यु हो जाती है, एसी काल्पना है| इन स्थानों पर अघात होने से जीव का नाश होता है, इसलिए ये जीव स्थान Vital parts भी कहलाते है| जीवस्थान एवं Vital parts का योगार्थ एक ही है| मर्म वितरण आयुर्वेदिक शरीर का विशेष भाग है| इसमें संदेह नही, परन्तु इसकी विशेषताओं का हमें ठीक आंकलन नही हो रहा है, की मर्मों के निमित्त हमे अनेक अंगों और स्थानों का जिनका विवरण पिछले अध्यायों में नही हुआ है, बहुत उपयोगी विवरण मिलता है|”

अनुभव से यह सिद्ध हुआ है की यदि इन स्थानों पर समुचित शास्त्रोक्त चिकित्सा क्रियाविधि का उपयोग किया जाय तो शरीर को निरोगी एवं चिरायु बनाया जा सकता है| साथ ही विभिन्न सुखसाध्य, कृच्छ्रसाध्य एवं असाध्य रोगों में मुक्ति पाई जा सकती है| मर्मविद्या- मर्मज्ञ विभिन्न ऋषि मुनियों ने सर्व-सामान्य के लिए सुलभ एवं उपयोगी योग- प्राणायाम से प्रथक उन लोगों के लिए मर्म विद्या/ मर्म चिकित्सा का अन्वेषण किया, जो निरंतर लोक कल्याण, लोकहित, लोकानंद उपलब्ध कराने वाले समाधि और ब्रह्मज्ञान के आकांक्षी है| निरंतर सांसारिक हितचिंतन में संलग्न साधको के लिए नियमित रूप से स्थूल यौगिक आसन व्यायामादी/ प्राणायाम द्वारा शरीर को स्वस्थ रखने का उपाय करना संभव नही है| उनको मर्म विद्या/चिकित्सा द्वारा सद्यःफल प्राप्त होता है, जो शारीरिक आरोग्य, मानसिक शांति एवं अध्यात्मिक उन्नति एवं परम ब्रह्म से तदाकार होने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है| जहाँ एक और मर्म विद्या के द्वारा लौकिक/परलौकिक सुखों की प्राप्ति संभव है, वहीँ इस विद्या के दुरूपयोग से यह घातक भी हो सकती है| अतः मर्म चिकित्साविद के अतिरिक्त यह विद्या राजाओं एवं योद्धाओं को ही सिखाई जाती थी| वर्तमान सन्दर्भ में यह समय वेद विद्या-प्रकाशन का कल है| हजारों वर्षों से अप्रकाशित वैदिक ज्ञान को आज के सन्दर्भ में लोक कल्याण हेतु प्रस्तुत करने की आवश्यकता है|

मर्म चिकित्सा विज्ञान की आधारशिला

भारतवर्ष में शल्य तंत्र की एतिहासिक प्रष्ठभूमि पर द्रष्टिपात करने पर इसका सम्बन्ध वेदों से मिलता है| शिरोसंधान, टांग का काटना और लौह निर्मित टांग का प्रत्यारोपण, देवचिकित्सक अश्विनीद्वय द्वारा किए गए शल्य कर्मों के कुछ उल्लेखनीय उदहारण है| जैसा की सर्वविदित है की महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रतिपादित सुश्रुत संहिता, शल्य तंत्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ है, जिसको ईसा से 300 से 3000 वर्ष पूर्व का माना जाता है| वास्तव में आज जितना भी हम भारतीय शल्यतंत्र के विषय में जानते है वह सिर्फ सुश्रुत संहिता के माध्यम से ही संभव हो चुका है इसके आभाव में शल्यतंत्र में उल्लिखित किसी भी शल्यकर्म (आपरेशन) के विषय में जानना असंभव है| सुश्रुत संहिता न केवल हजारों वर्ष पूर्व विकसित शल्य तंत्र के स्तर का ज्ञान होता­ है, वरन आधुनिक शल्य तंत्र की नींव भी सुश्रुतोक्त विज्ञान में समाहित दिखाई देती है| आज सम्पूर्ण चिकित्सा जगत इस सत्य को स्वीकार करने लगा है|

marma points in body

भारतीय शल्य तंत्र का महत्वपूर्ण पक्ष है की यह विज्ञान परम्परागत हस्तकौशल से विकसित होता हुआ एक पूर्ण विकसित शैक्षणिक विषय के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ, जिसका अयुर्वेद के आठ अंगों में सर्वोपरि स्थान है|महर्षि सुश्रुत प्रथम व्यक्ति है, जिन्होंने शल्य तंत्र के वैचारिक आधारभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, जिसके आधार पर प्राचीन भारतवर्ष में शल्य कर्म किये जाते रहे| शल्य तंत्र के प्राचीनतम ग्रंथ सुश्रुत सहिंता में शल्य तन्त्र के अतिरिक्त अन्य विषय भी सम्मिलित कान, गले, और सर के रोग, प्रसूतितन्त्र और चिकित्साविज्ञान विषयक आचार संहिता आदि विषय महत्वपूर्ण है| महर्षि सुश्रुत ने सबसे पहले शवच्छेदन विधि का वर्णन किया था| महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रतिपादन नासासंधान विधि वर्तमान में विकसित प्लास्टिक सर्जरी का मूल आधार बनी है, इसे सभी लोग निर्विवाद रूप ले स्वीकार करते है| आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी विषयक ग्रंथों में सुश्रुत की नासासंधान विधि का उल्लेख ‘इंडियन मेथड ऑफ़ राइनोप्लास्टी’ के रूप किया जाता है|

महर्षि सुश्रुत के अनुसार मनुष्य शरीर के में 107 मर्मस्थान, 700 सिरायें, 300 अस्थियाँ, 400 स्नायु 500 मांसपेशियां और 210 संधियाँ होती है| मर्म धातु भेद से विभिन्न प्रकार के होते हैं| पांच प्रकार के मर्मों में सिरामर्म अत्यंत महत्वपूर्ण होते है| इन पर होने वाला अधात घातक होता है, इसलिए सिराओं का विशिष्ट वर्णन सुश्रुत संहिता में किया गया है| सिरावेधन, रक्तमोक्षण की एक महत्वपूर्ण विधि है| इस महत्वपूर्ण पराशाल्यकर्म के अनंतर कोई घातक परिणाम नही हो, इसलिए सिराओं का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है| शल्यकर्म(ऑपरेशन) एवं सिरावेधन के अनंतर इन मर्म स्थानों को अघात से बचाना आवश्यक है| मर्म चिकित्सा के सन्दर्भ में भी सिराओं का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि मर्म चिकित्सा के सद्यःप्रभावकारी एवं असावधानी पूर्वक किए जाने पर घातक होने के कारण इन विशिष्ट सिराओं के अभिघात का भय रहता है|

इस स्रष्टि के निर्माण काल से ही पंचभूतात्मक सत्ता का अस्तित्व रहा है| पृथ्वी, जल तेज, वायु और आकाश के सम्मिश्रण से त्रिदोषात्मक मनुष्य-शरीर की उत्पत्ति हुई है| मनुष्य के उदभव-काल से ही मनुष्य शरीर रोगाक्रांत होता रहा है| तभी से मनुष्य स्वस्थ्य संवर्धन, रोग प्रतिरक्षक एवं रोगनिवारण के लिए अनेक उपाय करता आया है| मनुष्य की समस्त शरीर क्रियाओं का नियमन त्रिदोष(वाट, पित्त और कफ) के द्वारा किया जाता है| वैकारिक अवस्था में यह तीनों दोष विभिन्न रोगों का कारण बन जाते है| सामान्य और वैकारिक दोनों अवस्थाओं में दोषों का विभिन्न सिराओं के माध्यम से शरीर में परिवहन  किया जाता है| यह कहना पूर्णतया उचित नही है की दोष किसी विशेष सिरा के माध्यम से ले जाया जाता है| परन्तु दोषों की प्रधानता के कारण सिराओं को वातवाही, पित्तवाही, कफवाही सिरा की संज्ञा दी जाती है| इन्ही स्थान विशेष की विशिष्ट सिराओं के वेधन से शोथ, विद्रधि, त्वकरोग आदि अनेक रोगों में आश्चर्यजनक लाभ होता है|

सुश्रुत के अनुसार वातवह, पित्तवह, कफवह और रक्तवह सभी सिराओं का उदगम स्थल नाभि है, जो की महत्वपूर्ण मर्म स्थान है| नाभि से यह सिरायें ऊधर्व, अध% एवं तिर्यक दिशाओं की ओर फैलती है| नाभि में प्राण का विशेष स्थान है| पंचभूतात्मक स्रष्टि में जीव प्राणाधान से ही सजीव और उसके अभाव में निर्जीव होता है| गर्भावस्था में गर्भस्थ शिशु का पोषण माता के गर्भनाल से होता है| गर्भनाल गर्भस्थ शिशु की नाभि से संलग्न होती है| जीवन के प्रारंभिक काल में नाभि का महत्वपूर्ण कार्य होता है, परन्तु बाद के जीवन में भी नाभि को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है| सात सौ सिराओं में दस सिरायें महत्वपूर्ण होती है| वातज या vatवातवह सिराओं की संख्या एक सौ पिचहत्तर होती है| पित्तज या पित्तवह सिराओं की संख्या एक सौ पिचहत्तर होती है| कफज या कफवह सिराओं की संख्या एक सौ पिचहत्तर होती है| रक्त के स्थानों/आशयों, विशेष रूप से यकृत और प्लीहा से सम्बंधित सिराओं की संख्या भी एक सौ पिचहत्तर बताई गई है|

एक शाखा में पच्चीस वातवह सिरायें होती है| इसी तरह चारों (दो बाहु और दो अध%शाखा) में कुल मिलकर सौ वातवह सिरायें है| चौंतीस वातवह सिरायें वक्ष और उदर प्रदेश में होती है (जिनमे से अथ शिश्न और गुदा से सम्बंधित है) दो शिराएँ प्रत्येक पार्श्व में होती हैं- (चार)| छह सिरायें प्रष्ट भाग में स्थित है| छह सिरायें उदर में तथा दस सिरायें वक्ष में स्थित है| इक्तालीस सिरायें उर्ध्र्व जत्रुगत प्रदेश में होती है| चौदह सिरायें कंठ में, चार कर्ण में, नौ जिव्हा में, छह नासा में और आठ नेत्र में होती है| कुल वातवाही सिराओं की संख्या एक सौ पिचहत्तर होती है| अन्य तीन प्रकार की सिराओं का भी यही क्रम होता है| मात्र नेत्र में एक परिवर्तन है, नेत्र में पित्तवाही सिरायें दस होती है, तथा कर्ण में दो पित्तवाही सिरा होती है| जिन सिराओं का वेधन नही करना चाहिए उनके वेध से निश्चय ही वैकल्य तथा म्रत्यु हो जाती है| शाखाओं में चार सौ, कोष्ठ(धड़) में एक सौ छत्तीस, शिर (ग्रीवा के उपर) में एक सौ चौसठ सिरायें होती है| इन सिराओं में से शाखाओं में सोलह, कोष्ठ में बत्तीस और शिर में पचास सिरायें अवेध्य है| एक सक्थि में सौ सिरायें होती है| इनमे एक जलधरा और तीन आभ्यंतर (ऊर्वी नामक दो, तथा लोहिताक्ष एक) अवेध्य होती है| ऐसा ही दूसरी सक्थि और बाहू में निर्दिष्ट है| इस प्रकार चारों शाखाओं में कुल सोलह सिरायें अवेध्य है| श्रोणीप्रदेश में बत्तीस सिरायें होती है| उनमे आठ अवेध्य है- दो-दो विटपों में और दो-दो कातिक तरुणों में| एक एक पार्श्व में आठ-आठ सिरायें होती है| उनमे से एक-एक उनमे से एक-एक ऊधर्वगा शिराओं और पार्श्व संधिगत दो सिराओं को शस्त्र कर्म के समय बचाना चाहिए| पीठ में प्रष्ट वंश के दोनों ओर चौबीस सिरायें है| उनमे ऊपर जाने वाली ब्रह्ती नामक दो-दो सिरायें अवेध्य है| उतनी ही चौबीस उदार में है, उनमे मेढª के ऊपर की रोमराजि के दोनों ओर दो-दो सिराओं को बचाना चाहिए|

चालीस सिरायें वक्ष प्रदेश में होती है| उनमे से चौदह अवेध्य है| ह्रदय में दो, स्तनमूल में दो-दो, स्तनरोहित, अपलाप, अपस्तब्ध इनके दोनों ओर आठ, इस प्रकार पीठ, उदर और उर में बत्तीस सिरायें अवेध्य होती है| जत्रु के ऊपर एक सौ चौंसठ सिरायें होती है| इनमे से छप्पन सिरायें ग्रीवा में होती है| उनमे से मर्मसंज्ञक बारह सिरायें है| दो क्रकाटिका, दो विधुर इस प्रकार ग्रीवा में सोलह सिरायें होती है| उनमे संधि धमनी जो दो-दो है, उनको बचाना चाहिए| जिहवा में छत्तीस सिरायें होती है| उनमे नीचे की सोलह सिराओं में से रसवहा दो, तथा वाग्वहा दो अवेध्य है| नासा में चौबीस सिरायें होती है, उनमे से नासा के समीपवर्ती चार सिराओं को बचाना चाहिए| उन्ही में से तालू के मृदुप्रदेश में एक सिरा को बचाना चाहिए| दोनों आँखों में अड़तीस सिरायें होती है| उनमे अपांगो की एक-एक सिरा को बचाना चाहिए| दोनों कानों में दस सिरायें होती है| उनमे से शब्दवाहिंनी एक-एक सिरा को बचाना चाहिए| मस्तक में बारह सिरायें है| उनमे उत्पेक्ष में दो, सीमांत में एक-एक और अधिपति की एक सिरा को बचाना चाहिये| इस प्रकार जत्रु के ऊपर पचास अवेध्य सिरायें है|

सुश्रुत ने रक्तमोक्षण और सिरा वेधन के सन्दर्भ में विभिन्न सिरा मर्मों का विस्तृत उल्लेख किया है| रक्तमोक्षण को शाल्यकर्म का पूरक भी माना जाता है| सिरा वेधन, रक्तमोक्षण की एक महत्वपूर्ण विधि है| सिरा वेधन के अतिरिक्त अलाबू, श्रंग और जलौका द्वारा भी रक्तमोक्षण किया जाता है| जितनी भी अवेध्य सिरायें है या तो वह मर्म स्थान है अथवा मर्म के समीप स्थित है| उन स्थानों पर छेदन, भेदन आदि शस्त्र कर्म, अग्नि कर्म, एवं रक्तमोक्षण का प्रयोग नही करना चाहिए|