विभिन्न रोगों में सामान्य जड़ी-बूटियों का प्रयोग

हमारे देश के प्रत्येक घर में भोजन निर्माण और अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बहुत सारी वस्तुऐ प्रयोग में लाई जाती हैं | नमक, चीनी, गुड़, जीरा, हींग, धनिया, हल्दी, अजवाइन, लौंग, सोंठ, पीपल (पिप्पली), कालीमिर्च, जायफल, तेजपत्र, दालचीनी, सरसों का तेल, नारियल का तेल, देसीघी, कर्पूर, कत्था, प्याज, लहसुन, अदरक, आलू, लौकी और घीकुवांर आदि कुछ महत्वपूर्ण मसाले/वस्तुओं का प्रयोग विभिन्न रोगों में सामान्यत: किया जाता है | कुछ विशेष रोगों में इनका प्रयोग निम्न प्रकार किया जाता है |

  • नस खिंच जाने की स्थिति में- सैंधा नमक के पानी से सिकाई करनी चाहिए त्तथा हल्दी, नमक, सरसों के तैल का स्थानीय प्रयोग (Local application) किया जाता है |
  • सूजन (Swelling/ Inflammation)- हल्दी व चूने का लेप (स्थानीय प्रयोग) लाभकारी होता है |
  • गुमचोट लगने/नील पड़ना (Contusion/bruise)- चोट लगने से सूजन होने पर शुद्ध हल्दी का चूर्ण 1/2-1 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ पीने से बहुत लाभ होता है |
  • चोट लगने पर जामुन की गुठली पीस कर लगाने से खून बंद हो जाता है |
  • मोच आने और हड्डी की चोट में भी हल्दी का बाह्यऔर आभ्यांतर प्रयोग लाभकारी है |
  • Herpes Zooster- नमक (Common salt) को गरम पानी में गाढ़ा घोल बनाकर स्वच्छ रुई से स्थानीय प्रयोग करना चाहिए इससे फफोले नहीं पड़ते हैं तथा जलन रो दर्द भी शीघ्रता से नष्ट होता है |
  • त्वक विकार (Skin lesions, urticaria)- हल्दी का स्थानीय प्रयोग व खाने के लिए प्रयोग कराना चाहिए |
  • आंव, दस्त (Dysentry)- आंव, दस्त की स्थिति में सोंठ और सौंफ का प्रयोग लाभकारी होता है | यदि दूध पीने से आंव, दस्त की स्थिति होती हो तो दूध में सोंठ मिलाकर पीना चाहिए |
  • अतिसार (Diarrhoea)- नमक और चीनी का पानी में घोल बनाकर (मुख द्वारा) प्रयोग करना चाहिए |
  • कृमिविकार (Worm infestation)- 4 भाग अजवाइन, 2 भाग कालानमक, 1 भाग हींग मिलाकर चूर्ण बनाकर 2 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम गर्म पानी से प्रयोग करना चाहिए |
  • फीताकृमि और अंकुश कृमि (Tape worm and Hook worm)- फीताकृमि और अंकुश कृमि के लिए आडू (Peach) के पाँच पत्ते, नीम के पाँच पत्ते और मात्रा में दूब घास को धोकर साफ कर पीसकर चटनी बनाकर प्रयोग कराने से लाभ होता है |
  • बलगम के साथ खांसी (Cough with sputum) – दूध में पिप्पली उबालकर लेना लाभप्रद है |
  • खांसी- (Cough)- हल्दी भून कर दूध से आधा चम्मच सुबह शाम लेने से खांसी ठीक हो जाती है | अत्यधिक बलगम (Excessive expectoration) की स्थिति में दूध के साथ सोंठ, मरिच, पिप्पली का चूर्ण का प्रयोग करते हैं | पिप्पली क्षीरपाक का प्रयोग फेफड़ों के रोगों में लाभप्रद है |
  • खांसी (Cough) में अदरक के स्वरस का शहद में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए | यदि दूध पीने से खांसी होती हो तो त्रिकटु को दूध में मिलाकर पीना चाहिए |
  • फुफ्फुस आवरण शोथ (Pneumonia)- जायफल को घिसकर शहद के साथ चाटने से और सैंधानमक पीसकर छाती में लगाने से लाभ होता है |
  • सर्दी, नजला (llergic rhinitis)- कालीमिर्च, हल्दी भूनकर आधा चम्मच सुबह शाम तथा (हर्रा) का चूर्ण आधा चम्मच सुबह शाम गर्म जल से लेने पर लाभ होता है |
  • काली मिर्च को भिगोकर, रगड़कर एंव छिलका निकालकर, सुखाकर सुरक्षित रख लें | चार दिनों दाँतों से चबाकर जीभ के नीचे रखने पर सर्दी, जुकाम में तुरंत आराम मिलता है |
  • जुकाम (Cold and Coryza)- 4-5 बूंद सरसों का तैल का नस्य (नासिका रन्ध्रों द्वारा ली जाने वाली औषधि) जुकाम में अत्यंत लाभकारी होता है |
  • गठिया एंव मांसपेशियों का दर्द (Arthritis and Muscular pain)- अजवाइन, लहसुन आदि को तैल में पकाकर एंव कपूर मिलाकर स्थानीय प्रयोग करते है | लहसुन का तैल, लहसुन का रस और सरसों के तैल की मालिश जोड़ों के दर्द में करते हैं |
  • संधिवात, गठिया (Joints pain)- दूध से लेने पर लाभ होता है |
  • नागर मोथा जोड़ों के दर्द की अचूक दवा है | नागर मोथा (साइप्रस रोटंडस) की जड़ का चूर्ण 1/2 ग्राम से 1 ग्राम, सुबह शाम लगातार खाने से आमवात, संधिवात में लाभ होता है अन्य प्रचलित आयुर्वेदिक दवाओं एंव एलोपैथिक वेदनाहर दवाओं के विपरीत इस दवा का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है |
  • जीर्ण संधिवात, गठिया- एरण्ड का तैल मालिश के लिये व 1 से 2 चम्मच दूध के साथ पीने के लिये देना चाहिए | गठिया रोग में वरित (Enema) के लिये भी एरण्ड तैल का प्रयोग लाभदायक होता है |
  • व्रण रोपक (घाव) भरने के लिये (Wound healing)- देसी घी का स्थानीय प्रयोग, मलाई का स्थानीय प्रयोग, हल्दी का स्थानीय व आभ्यान्तर प्रयोग लाभकारी है |
  • व्रण रोपक (घाव भरने के लिये)- आलू का गूद, घीकुवांर का गूदा तथा पुराना गाय का घी लगाने से पुराने घाव भर जाते हैं |
  • मुँह के व्रण (घाव) भरने के लिये (Wound healing in oral cavity)- अमरुद की पत्तियों का काढ़ा तथा कत्थे का स्थानीय प्रयोग करना चाहिए |
  • कर्णशूल – लहसुन का तैल, (लहसुन के रस को सरसों के तैल में पकाकर) कान में डालने से लाभ होता है |
  • सिर दर्द (Head ache)- लौकी के गुदे को सिर में लगाने से लाभ होता है |
  • निद्रा नाश (Insomnia)- ब्राह्यी, जटामांसी का चूर्ण आधा चम्मच रात को सोते समय गाय के दूध से लेने पर लाभ होता है |
  • मेधा शक्ति वर्धन के लिये (To increase Mental strength)- बादाम, कालीमिर्च चूर्ण को गाय के घी में भूनकर, दूध में उबालकर प्रयोग कराया जाता है |
  • बाल झड़ना (Hair Loss)- ऑवले का प्रयोग खाने और लगाने के लिये करना चाहिये |
  • नेत्र ज्योतिवर्धन हेतु होली के त्यौहार के अवसर पर जब आँवले पक जाते है उस समय आँवले तोड़कर सुखा लें तथा बीज निकालकर चूर्ण बनाकर, आंवले के रस में भिगाकर सुखा लें, इस प्रक्रिया को 21 बार दोहरायें, इस आमलकी रसायन का प्रयोग शहद के साथ लाभप्रद होता है |
  • मोतिया बिंद (Cataract)- सफेद प्याज का स्वरस, छोटी मक्खी के शहद में मिलाकर 1 बूंद आँख में डालने से लाभ होता है |
  • मधुमेह (Diabetes)- दालचीनी, तेजपत्र, मेथी, जामुन के बीज, करेले का चूर्ण- 1 / 2 चम्मच सुबह शाम प्रयोग करने से मधुमेह रोग में लाभ होता है |
  • Post Menopause Sndrome (P.M.s)- जीरा तथा धनिया पाउडर मिलाकर आधा चम्मच सुबह शाम प्रयोग करने से लक्षणों में तुरंत लाभ होता है |
  • ह्रदय रोग (Heart Disease)- बड़ी इलायची के बीच का चूर्ण शहद मिलाकर चाटना चाहिए |
  • रक्तचाप (P.) व अत्यधिक पसीने की स्थिति में यदि मेथी का प्रयोग आवश्यक हो तो मेथी बीज को गाय के दूध में भिगाकर, तत्पश्चात सुखाकर घी में भूनकर पीस लें तथा 1 / 2 चम्मच सुबह शाम गाय के दूध से प्रयोग कराना चाहिए |
  • ज्वर व अत्यधिक पसीने को स्थिति- आधा चम्मच धनिया पाउडर, सुबह शाम नारियल के पानी के साथ प्रयोग कराना चाहिए | लम्बे समय तक बुखार रहने पर गिलोय का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है |
  • डेंगू एंव अन्य विषाणु जन्य बुखारों में अजवायन, खूबकलां तथा गिलोय के काढ़े का प्रयोग लाभकारी होता है | प्लेटलेट्स की कमी होने पर पपीते के पत्ते का स्वरस अत्यंत लाभकारी है | भोजन में हल्का, सुपाच्य भोजन तथा अनार और अन्य फलों के रस का प्रचुर मात्रा में प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है |
  • गर्मी लगने पर- सौंफ और कालीमिर्च का मिश्री से बना शरबत पीना चाहिए | लू लगने की अवस्था में पुदीना युक्त कच्चे आम का पन्ना प्रयोग करना चाहिए |
  • स्तन्यवर्धक (Medication inducing Lactation)- जीरा चूर्ण दूध के साथ पिलाना चाहिए |
  • जलन की चिकित्सा- जलन की चिकित्सा जल है |
  • ठण्डे पानी की पट्टी या धारा डालने से जलन शांत होती है |
  • घी या मक्खन को कांसे के बर्तन में रख कर पानी से सौ बार धोये घी या मक्खन का प्रयोग लगाने के लिए खाने के लिए करना जलन शांत करने के लिए लाभकारी होता है |
  • हाथ पैर या शरीर के किसी भाग पर जलन होने पर लौकी, या आलू का गूदा मलते है या लौकी और आलू को बारीक़ पीस कर लेप भी कर सकते है |
  • छाती में जलन होने पर नारियल पानी, ठण्डा दूध या जौ का सत्तू ठण्डे पानी के साथ पीने से लाभ होता है |
  • धनियाँ बीज को कूट कर पानी में भिगोकर, मसल कर तथा छान कर पिलाने से जलन एंव बुखार में बहुत लाभ होता है इससे पेशाब की जलन में भी फायदा होता है |
  • जलने पर (Burn lesions)- नारियल का तेल और चूने के पानी का स्थानीय प्रयोग जलने पर लाभकारी होता है |
  • कैंसर जैसे रोगों में रेडियोथेरापी के बाद स्थानीय जलन को दूर करने के लिए घी कुंवार (ऐलोवेरा) का स्थानीय प्रयोग लाभदायक होता है |